No One Has Ever Become Poor By Giving!

  • Phone:+91 9953659128
  • Email: info@muskanforall.com
Franchise Volunteer Donate Us

DAHEJ EK SAMAJIK KUPRATHA

Dahej Ek Samajik Kupratha

DAHEJ EK SAMAJIK KUPRATHA

दहेज: एक सामाजिक कुप्रथा
हमारे समाज में अनेक कुप्रथाएं व्याप्त हैं। वर्तमान में जिस कुप्रथा ने हमारे समाज को अत्यधिक कलंकित किया है वह है आज की दहेज-प्रथा। दहेज शब्द अरबी भाषा के ’जहेज’ शब्द का परिवर्तित रूप है। ’जहेज’ का अर्थ होता है-’भेंट या सौगात’। भेंट के यह भाव होता है कि काम हो जाने पर स्वेच्छा से अपने परिजन या कुटुम्ब को कुछ अर्पित करना। लेकिन, आज दहेज-प्रथा की व्याख्या है-कन्यापक्ष की ओर से वरप़क्ष को मुंहमांगा दाम देना। इससे स्पष्ट होता है कि विवाह के पूर्व सशर्त आवश्यक देन को आज का ’दहेज’ एवं विवाह के बाद स्वेच्छा से विदाई के समय की देन को ’भेंट’ कहते हैं।

वर्तमान समाज में दहेज का रूप अत्यंत विकृत हो गया है। दहेज एक व्यापार का रूप ले चुका है। स्थिति ऐसी उत्पन्न हो गई है कि जिस पिता के पास धन का अभाव है, उसकी पुत्री का विवाह असंभव प्रतीत होने लगता है। दहेज पिता के लिए सबसे बड़ा दण्ड साबित हो रहा है। लड़के का पिता अपने लड़के का मोल-भाव वस्तु के क्रय-विक्रय के जैसा करता है। वर्तमान समय में हर प्रकार के लड़के का मोल निश्चित है। उपभोक्ता सामग्री की भांति तय कीमत पर कोई भी लड़का  खरीद सकता है। कुछ ऐसे भी लाचार पिता हैं जिन्हें दहेज के अभाव में अनमेल विवाह कबूल करना पड़ता है। ऐसा मालूम पड़ता है कि लड़की शादी में इन्हीं कटिनाइयों को देखकर महाकवि कालिदास ने ’अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ में लिखा है-’कन्यापितृत्वं-खलु नाम कष्टम्। अर्थात कन्या का पिता होना ही कष्टकारक है।

विवाह के बाद भी दहेज रूपी राक्षस वधू का पीछा नहीं छोड़ता। लोभी और अकर्मण्य दामाद बार-बार वधू को अपने पीहर से धन लाने के लिए प्रताड़ित करता है। वधुएं इससे ऊबकर आत्महत्या तक करने पर विवश हो जाती हैं। आए दिन ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं। इस सामाजिक व्यवस्था में जामाता को ’दशम ग्रह’ माना जाता है जो बिल्कुल सही और स्वाभाविक है।

अशिक्षा दहेज-प्रथा का मूल कारण है। सभी बच्चे-बच्चियों को पढ़ाना-लिखाना होगा। रेडियों, दूरदर्शन, समाचार पत्र एवं स्वयंसेवी संगठनों के सहारे दहेज-प्रथा के कुप्रभावों का समाज में प्रचार करना होगा। लेखक एवं कवियों को भी इस प्रथा के विरूद्ध आग उगलनी पड़ेगी, जैसे-प्रेमचन्द ने अपने उपन्यास ’निर्मला’ में दहेज प्रथा पर चोट की है।

दहेज प्रथा को रोकने के उपाय
(1) दहेज प्रथा को रोकने के लिए बने हुए कानून का सख्ती से पालन कराया जाना चाहिये।
(2) अन्तर्जातीय विवाहों को प्रोतसाहन देना होगा। इससे युवतियों को योग्य वर खोजने में सरला रहेगी।
(3) लड़कियों को उच्च शिक्षा देना आवश्यक है।
(4) लड़कियों को अपना जीवन साथी स्वंय चुनने का अधिकार होना चाहिये।

उपसंहार:
मुस्कान एनजीओ द्वारा तेह सन्देश दिया जाता है के आज के समय के युग में भी हमें दहेज प्रथा के खिलाफ कदम उठाने चाहिए और हमें मिलकर प्रण लेना होगा कि ना ही हम दहेज लेंगे और ना किसी को लेने देंगे। वह अंतरजातीय विवाह ने भी दहेज प्रथा को कुछ हद तक पीछे करने में मदद की है। इसके  समाज के शक्तिशाली लोग, नेता एवं बड़े-बड़े पदाधिकारी एक ओर तो खुले मंच पर दहेज-प्रथा की भत्र्सना करते हुए यह नारा लगाते हैं-’दहेज लेना अपराध है’-तो दूसरी ओर वे ही लोग अधिक दहेज देकर समाज में अपना बड़प्पन दिखाते हैं। जैसे कह रहे हैं-’दहेज लेना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ वह किसी भी अन्य जाति के योग्य लड़के को जो दहेज़ के खिलाफ होकर उसे कन्या देने में थोड़ा भी संकोच नहीं करना चाहिय। दहेज प्रथा के कारण ही नारी जाती को कई प्रकार के अत्याचार को सहना पड़ा है। आज सब को हर घर तक यह संदेश को पहुंचाना चाहिए कि दहेज लेना पाप है और देना सही नहीं है।

Enquiry Form