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KANAYA BHRUN HATAYA KE KARAN

Kanaya Bhrun Hataya Ke Karan

KANAYA BHRUN HATAYA KE KARAN

कन्या भ्रूण हत्या के कारण
कन्या भ्रूण हत्या का मुख्य कारण यह है कि लोग आज भी बेटी की बजाय बेटे की चाह रखते हैं! भारत आधुनिकता की और बढ़ रहा हैं परन्तु आज भी कई लोगो की सोच में बदलाव नहीं आया हैं आज भी लोगों के मन में बेटे और बेटी को लेकर फर्क हैं! आज भी लोग बेटों को ज्यादा महत्व देते हैं, इसी सोच के चलते यह माना जाता हैं लड़की वंश आगे नहीं बढ़ा सकती, वंश को आगे बढ़ाने के लिए बेटे की जरूरत होती हैं! परन्तु अगर इस दुनिया में लड़किया ही नहीं होंगी तो वंश को आगे कौन बढ़ाएगा! वंश को आगे बढ़ाने के लिए लड़की का होना बहुत जरूरी हैं! परन्तु भारत में आज भी यही सोचा जाता हैं कि यदि कोई लड़की पढ़-लिख गयी और नौकरी भी करने लगी तो उसकी सारी कमाई उसके ससुराल चली जायगी! इन्ही कारणों से लोगों को लगता हैं कि लड़की के जन्म सिर्फ खर्चा ही बढ़ता हैं! परन्तु अगर बेटे का जन्म हुआ तो वंश आगे बढ़ेगा और शादी में दहेज भी लाएगा!

लड़कियों को हमारे समाज में हमेशा से ही बोझ माना गया है पहले पढ़ाई का बोझ, फिर शादी का बोझ और अन्य खर्च के बोझ से भी उसकी तुलना की जाती हैं! लेकिन यह स्त्री-विरोधी सिर्फ गरीब परिवारों तक ही सम्भव नहीं है इस भेदभाव के पीछे सांस्कृतिक मान्यताओं एवं सामाजिक नियमों का अधिक हाथ होता हैं! भारत में किए गए अध्ययनों के अनुसार कन्या भ्रूण हत्या के तीन कारण हैं जैसे कि- आर्थिक उपयोगिता, सामाजिक-आर्थिक उपयोगिता, एवं धार्मिक कार्य।

1) आर्थिक उपयोगिता के अनुसार लड़कियों की तुलना में लड़कों को पुश्तैनी व्यवसाय में काम करने, आय अर्जन करने या फिर बुढ़ापे में माता-पिता को सहारा देने की अधिक सम्भावना होती हैं!

2)
शादी होने पर एक लड़का, अपनी पत्नी को लाकर घर की लक्ष्मी में वृद्धि करता हैं जो कि घरेलू कामों में भी सहायता करती हैं और दहेज के रूप में आर्थिक रूप में लाभ पहुंचाती हैं और जबकि लड़कियां तो शादी करके चली जाती हैं तथा दहेज के रूप में अपने माता-पिता पर आर्थिक बोझ होती हैं!

3)
कन्या भ्रूण के पीछे सामाजिक-आर्थिक उपयोगिता संबंधी कारक भी एक मुख्य कारण हैं! भारत में भी चीन की तरह पुरुष संतति परिवारों की यह प्रथा हैं कि वंश चलाने के लिए कम से कम एक लड़का होना जरूरी हैं और कई लड़के होने से परिवार के ओहदे को अतिरिक्त रूप से बढ़ा देते हैं!

4)
धार्मिक अवसर भी कन्या भ्रूण हत्या का मुख्य कारण हैं, इसमें हिन्दू परम्पराओं के अनुसार माता-पिता की मृत्यु होने पर उनकी आत्मा की शांति के लिए केवल बेटा की मुखाग्नि दे सकता है।

ऐसे कुछ वास्तविक कारण हैं जिसकी वजह से माता-पिता और परिवार बेटियों के जन्म को रोकने के अपराध करने पर मजबूर हो जाते हैं और अपने बच्चे को इस दुनिया में आने से रोक देते हैं-

1)दहेज प्रथा  
इस समस्या का सबसे प्रमुख कारण यह हैं कि दहेज के विरुद्ध अनेक कानून होने के बावजूद भी समाज आज भी दहेज मुक्त नहीं हो पाया हैं, बल्कि दिन-प्रतिदिन इसकी मांग बढ़ती ही जा रही हैं! दहेज लेना और दहेज देना दोनों ही गैर-कानूनी हैं, क्योकि एक और तो यह कालेधन को बढ़ाता हैं और दूसरी और यह बेटियों के प्रति नकारात्मक प्रभाव को बढ़ाता हैं! इसीलिए परिवार में बेटियों को बोझ और एक जिम्मेदार के रूप में देखा जाता हैं! यदि बेटी पढ़-लिख कर योग्य भी बन जाए और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी हो जाए फिर भी माता-पिता को लड़की की शादी के लिए दहेज की व्यवस्था करनी ही पड़ती हैं!

2)
महिला का समाज में स्थान
सदियों से हमारे समाज में लड़कियों को हमेशा से ही दोयम दर्जा दिया जाता हैं और लड़कों को हमेशा ज्यादा महत्व दिया जाता हैं! परिवार में भी बेटे और बेटी में फर्क रखा जाता हैं! लड़को को शिक्षा, खान-पान आदि से सम्बन्धित सभी प्रकार की सुविधाएं दी जाती हैं और दूसरी तरफ लड़कियों को इन सभी सुविधाओं से वंचित रखा जाता हैं उन्हें इस तरह की कोई भी सुविधा नहीं दी जाती! परिवार वाले मानते हैं कि बेटे को परिवार का चिराग माना जाता था क्योकिं वह घर के वंश को आगे बढ़ाता हैं इसीलिए उनकी हर प्रकार की सुख-सुविधा का ध्यान रखा जाता हैं! जबकि परिवार लड़की के मामले में इतना उत्साहित नहीं होता! उन्हें इस प्रकार की सुख-सुविधा नहीं दी जाती बल्कि बेटी के साथ भेदभाव किया जाता हैं! जो परिवार अपनी बेटी का सम्मान नहीं कर सकता वह आने वाली बहु का भी सम्मान नहीं कर सकता!

3)
बेटी के अधिकारों का अभाव
हमारे समाज में बेटी को अपने ही परिवार में अधिकारों का अभाव रहता हैं उसके हर व्यवहार को बेटे से अलग रखा जाता हैं, जैसे बेटी को ज्यादा पढ़ाया नहीं जाता क्योकि उसे पराया धन समझा जाता हैं! परिवार के सभी संस्कारों में बेटों का मुख्य योगदान हैं, बेटियों को ये अधिकार नहीं दिए जाते! यहां तक की जिसका कोई बेटा नहीं हैं तो भी बेटी को माता-पिता के पार्थिव शरीर को मुखाग्रि देने के हक देने से मना किया जाता हैं! यही मान्यता बेटे होने की चाह बढ़ाती हैं! यहाँ तक की बेटी के माता-पिता  जाकर भी कुछ खा पी नहीं सकते! यदि किसी घर में बेटा नहीं हैं तो बुढ़ापे में माता-पिता अपनी बेटी की कमाई का नहीं खा सकते! ऐसी स्थिति में उन्हें अपना भविष्य खतरे में नजर आने लगता हैं और उनके मन में बेटे को लेकर जिज्ञासा उत्पन्न होती हैं!

निष्कर्ष
अंत में हम यही कह सकते हैं कि लड़कियों का भी लड़कों के बराबर ही हक होना चाहिए! लड़कियों को भी लड़कों के जितना ही महत्व देना चाहिए! मुस्कान एनजीओ की टीम भी लोगो तक यही सन्देश पहुँचाना जाती हैं! ताकि लड़कियां भी लड़कों के बराबर खड़ी हो सके!