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PRADUSHAN KE KARAN DESH ME PAD RAHE PARABHAW

Pradushan Ke Karan Desh Me Pad Rahe Parabhaw

PRADUSHAN KE KARAN DESH ME PAD RAHE PARABHAW

प्रदूषण के कारण देश में पड़ रहे प्रभाव
प्रकृति और मानव का सम्बंध आदि काल से चला आ रहा है। मानव जाति उस जटिल और समन्वित पारिस्थितिकीय श्रृंखला का एक अंग है जो अपने में वायु, पृथ्वी, जल तथा विविध रूपों में वनस्पति व पशु जीवन को समेटे हुए है। जब मानव का विकासात्मक क्रियाओं के परिणामस्वरूप प्रकृति की स्वच्छता तथा संतुलन भंग हो जाता है, तो इसके परिणामस्वरूप ‘प्रदूषण’ का जन्म होता है।

सारा विश्व प्रदूषण से आक्रान्त है क्योंकि, जनसंख्या का बढ़ता दबाव, आधुनिक औद्योगीकरण की प्रगति तथा इसके कारण वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं की संख्या व प्रजातियों में दिन-प्रतिदिन होने वाली कमी ने पारिस्थितिकीय तन्त्र के असंतुलन को जन्म दिया है। कामयाबी की चकाचौंध के फलस्वरूप पर्यावरण सम्बंधी जागरूकता विकास तथा सभ्यता के बढ़ने के साथ-साथ प्रकृति पर मानव का वर्चस्व बढ़ता गया है, जो आज पर्यावरण के मुख्य आधार वायु, जल, भूमि आदि को प्रदूषित कर मानव जीवन के लिये घातक बन गया है।

 मानव जब असभ्य था तब वह प्रकृति के अनुसार जैविक क्रियाएं करता था और प्राकृतिक सन्तुलन बना रहता था। विश्व का ध्यान अधिक से अधिक ओजोन परत के घटते जाने, तेजाबी वर्षा, जल, वायु, भूमि सम्बंधी परिवर्तन जैसे विषयों की ओर उत्तरोत्तर केन्द्रित हो रहा है। इन क्षेत्रों में नीति और कार्यवाही के बारे में अन्तरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन इससे अनेक विकासशील देशों की बंजर भूमि मरुस्थलों के बढ़ने और वनों के विनाश जैसी विशेष चिन्ताजनक पर्यावरणीय समस्याओं से ध्यान नहीं हटाया जाना चाहिए अनियोजित शहरीकरण मानव जाति के लिये एक और बड़ी समस्या है जो विकासशील देशों में गम्भीर रूप लेती जा रही है और उसके भविष्य में और गम्भीर होने की आशंका है।

किसी भी राष्ट्र की संपत्ति वहाँ की भूमि, जल और वन पर ही आधारित होती हैं। इस दृष्टि से भारत में हिमालय का विशेष महत्व है। यहाँ के घने जंगलों में अनेक प्रजातियों के जीव-जन्तु और वनस्पतियाँ पाई जाती है। गंगा और यमुना जैसी देश की प्रमुख नदियों का उद्गम और जल ग्रहण क्षेत्र हिमालय ही है। हिमालय भारत के गौरव, संस्कृति, सभ्यता और सृष्टि की प्राचीनता का प्रतीक बन कर सदियों से हमारे देश में प्रतिष्ठित ही नहीं रहा है, बल्कि भौतिक रूप से देश की जलवायु को नियंत्रित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है।

ध्वनि प्रदूषण से सरदर्द, उच्च रक्तचाप, मतली, कान में दर्द, चमड़ी की जलन, स्मरण शक्ति का ह्रास आदि कई शारीरिक रोग तथा मानसिक दबाव, निराशा, चिड़चिड़ापन, जी घबराना आदि मानसिक रोग भी उत्पन्न होते हैं। इसके अलावा कल-कारखानों एवं सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण ध्वनि प्रदूषण को ही माना जाता है। वैज्ञानिकों द्वारा किये गये परीक्षणों से यह सिद्ध हो चुका है कि 120 डेसीबल से अधिक की ध्वनि गर्भवती महिला, उसके गर्भस्थ शिशू, बीमार व्यक्तियों तथा दस साल से छोटी उम्र के बच्चों के स्वास्थ्य को अपेक्षाकृत अधिक हानि पहुँचाती है।

उपसंहार
उम्मीद है कि आपको यह लेख काफी अच्छा लगा होगा। इसके बारे में ओर जानकारी जानने करने  के लिए आप मुस्कान एनजीओ से संपर्क कर सकते है। वह दुनिया में सामाजिक सेवाएं प्रधान करते है। वह किसी की मदद के लिए कोई फीस या पैसे नहीं लेते। वह देश के लिए सबसे एनजीओ मने जाते है। वह सन्देश देते है कि पर्यावरण संरक्षण का अर्थ विकास ही समझा जाना चाहिए और इस कार्य में ग्रामीण तथा शहरी सभी लोगों को सक्रिय होकर हिस्सा लेना चाहिए। भारतीय संस्कृति में वनों के महत्व को समझते हुए उनके संरक्षण को उचित मान्यता दी गई है। हमारे यहाँ हरे-भरे वृक्षों को काटना पाप माना गया है। आज इसी भावना को लोगों में फिर से जगाने की आवश्यकता है। इसके अलावा प्रदूषण को कुछ उपायों द्वारा काफी सीमा तक नियत्रिंत किया जा सकता है।

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